जिन्होंने इस्लाम को मान्यता या अभी तक स्वीकार नहीं किया है, उन लोगों के अधिकार; इस्लामिक कानून, यानी कुरान में अल्लाह के आदेश और हज़रत मुहम्मद (सल्ल) की प्रथाओं के अनुसार संरक्षित किया गया है। जहाँ पड़ोसियों और व्यापार जैसे सामाजिक जीवन में एक साथ रहने की आवश्यकता होती है वहां किसी भी बे-ज़रर गैर-मुस्लिम के साथ इस तरह से व्यवहार नहीं किया जा सकता जो उन्हें परेशान करे।
अल्लाह ने जितने भी जीव बनाए हैं, उनमें से अल्लाह ने इंसान को अपना वार्ताकार स्वीकार किया है। कुरान में, विश्वासियों और गैर-विश्वासियों के बीच भेद-भाव की परवाह किए बिना, सभी लोगों को पृथ्वी पर अज़ीज़( प्रिय) और अल्लाह के प्रतिनिधि के रूप में माना जाता है[1]। इसी के साथ साथ, मनुष्य एक इच्छा शक्ति वाला प्राणी है। जो चीज मनुष्य को स्वर्गदूतों से भी श्रेष्ठ बनाती है, वह है उसकी इच्छाशक्ति। इसी इरादी क़ुव्वत के साथ, वह सही या गलत को मानने या न मानने का चुनाव करता है।
कुरान की आयतें बताती हैं कि जो लोग इस्लाम में परिवर्तित नहीं हुए हैं उनके साथ कैसे संबंध होने चाहिए:
हर मुसलमान को,
• गैर-मुस्लिमों को अच्छाई करने के लिए प्रोत्साहित करना, बुराई से बचने और मजबूर किए बिना[2] धर्म में प्रवेश करने के लिए उन्हें इस्लाम की व्याख्या करना[3]।
• अगर किसी के माता-पिता इस्लाम स्वीकार नहीं भी करते हैं, तो भी उन्हें उनके साथ अच्छा व्यवहार करना है[4]।
• पड़ोसियों के अधिकारों का पालन करना चाहे वे मुस्लिम हों या नहीं[5]।
• जिन लोगों ने अभी इस्लाम क़ुबूल नहीं किया है और जो युद्ध की स्थिति में नहीं हैं उनके साथ न्याय और दया के साथ व्यवहार करना[6]।
• यदि गैर-मुसलिमों के साथ कोई सुरक्षा समझौता किया गया है, तो उसका पालन किया जाना चाहिए और उनके जीवन को नुकसान नहीं पहुंचाया जाना चाहिए[7]।
• यदि कोई व्यक्ति ईमान नहीं भी लाता है, तो भी उसके साथ गलत व्यवहार नहीं किया जाना चाहिए और न्याय के साथ व्यवहार किया जाना चाहिए[8]।
यह अल्लाह द्वारा सख्ती से नियुक्त किये गए अहकाम हैं। कुरान के मूल सिद्धांतों और हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की प्रथाओं को देखते हुए और उदाहरणों से पता चलता है कि,गैर-मुसलिमों से शांति और सहिष्णुता के साथ संपर्क करना आवश्यक है, जब तक कि मुसलमानों के प्रति शत्रुतापूर्ण रवैया न हो।
[1] सूरह बकरा/30.
[2] सूरह बकरा/256.
[3] सूरह आल-ए-इमरान/104.
[4] लुकमान/14-15.
[5] सूरह निसा/36.
[6] सूरह मुमतहिना/8.
[7] सूरह तौबा/6.
[8] सूरह मायदा/8.
